चमोली । पर्यावरण से जुड़े मैती आंदोलन की शुरुआत वर्ष 1994 में चमोली जिले के राइंका ग्वालदम में जीव विज्ञान के प्रवक्ता रहे कल्याण सिंह रावत ने की थी। उन्हें मैती आंदोलन के लिए 26 जनवरी को दिल्ली में पद्मश्री पुरस्कार से नवाजा जा रहा है।
मूल रूप से चमोली जिले के बैनोली गांव निवासी कल्याण सिंह रावत वर्तमान में देहरादून में रहते हैं। इनके दो बेटे हैं जो राजकीय सेवा में हैं। मैती के तहत जब किसी बेटी की शादी होती है, तो वह विदाई से पहले एक पौधा रोपती है।

इसके जरिए वह पर्यावरण संरक्षण के साथ ही अपने मायके में गुजारी यादों के साथ-साथ विदाई लेती है। इस भावनात्मक आंदोलन के साथ शुरू हुआ पर्यावरण संरक्षण का यह अभियान आज उत्तराखंड के साथ ही पूरे भारत में चल रहा है।

पर्यावरण संरक्षण की अनूठी सौगात देता है मैती आंदोलन 

मैती आंदोलन के जरिए लोगों को पर्यावरण संरक्षण की अनूठी सौगात देने वाले कल्याण सिंह रावत ने चिपको आंदोलन की धरती से पेड़ों और जंगलों की उपयोगिता का अहसास दिलाया। 90 के दशक में वृक्षारोपण की असफलता ने मन में एक नया विचार दिया मैती और ये विचार आज मां के आंगन से लेकर सात समंदर पार तक अपनी चमक बिखेर रहा है। देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी नें भी मैती आंदोलन को सराहा था।   

19 अक्टूबर 1953 को जनपद चमोली के कर्णप्रयाग ब्लाॅक के बैनोली गांव में विमला देवी व त्रिलोक सिंह रावत के घर एक बिलक्षण प्रतिभा के बालक ने जन्म लिया। वन विभाग में कार्यरत पिता ने अपने इस बालक का नाम कल्याण सिंह रावत रखा। माता-पिता को विश्वास था कि एक न एक दिन उनका ये पुत्र उनका नाम रोशन करेगा। बचपन से ही कल्याण सिंह रावत मेधावी थे।

पेड़ों और जंगलों के प्रति लगाव उन्हें विरासत में मिला। जिस कारण से वे प्रकृति की और खींचते चले गए। इनकी प्राथमिक शिक्षा गांव के प्राथमिक स्कूल बैनोली (नौटी) में हुई तो 8वीं तक की शिक्षा कल्जीखाल और 10वीं, 12 वीं की शिक्षा अलकनंदा व पिंडर के संगम कर्णनगरी कर्णप्रयाग में पूरी हुई। जबकि स्नातक और स्नातकोत्तर की शिक्षा राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय गोपेश्वर से ग्रहण की।
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